"क्या क्या नहीं देखा"
डा. सलोनी चावला
दुश्मनों में वफ़ा, दोस्तों में बेवफ़ाई देखी है,
हमने मरहम में नमक की परछाई देखी है।
खींचते रहे लोग ऊंची लहरों की तस्वीरें,
हमने डूब कर समुद्र की गहराई देखी है।
खुशनसीब चलते रहे सीधे साफ रस्तों पर,
हमने एक कदम सागर, दूजे खाई देखी है।
वक्त दूर नहीं जब डिजिटल पलंग भी मिलेंगे,
बस हम वह ज़माना हैं जिसने चारपाई देखी है।
आज घरौंदे सिमट गए, आसमां भी हुआ तन्हा,
हमने भरे घर में दादी, चाची और ताई देखी है।
कदम बढ़ाते रहो, बढ़ने का नाम है ज़िंदगी,
हमने रुके हुए पानी में उगती काई देखी है।
आज के बालक बहुत ज़्यादा समझदार,
हमने तो मात - पिता की पिटाई देखी है।
शमां को मालूम था कि वह बुझ जाएगी,
लोगों ने तो सिर्फ़ लौ की अंगड़ाई देखी है।
बनी बनाई पोशाकों का दौर है आज,
हमने हर घर में कढ़ाई-बुनाई देखी है।
अमन और शांति बस किताबों में अमर हैं,
हवा की नैनों ने देश देश में लड़ाई देखी है।
खूबसूरत नज़रें सिर्फ़ चाँद ही नहीं देखतीं,
मैंने खूबसूरती में कामवाली बाई देखी है।
दौलत की कद्र महलों में रहने वाले नहीं करते,
करता है जिसने सिक्के सिक्के की कमाई देखी है।
काबिलियत जिसमें भी ज़्यादा होती है,
ज़माने ने हमेशा उसी में बुराई देखी है।
कर्म फल के तमाचे हल्के नहीं होते जनाब,
अच्छे अच्छों की अच्छी खासी धुलाई देखी है।
न्याय का लफ़्ज़ बेमायने हो गया सलोनी,
निर्दोषों को सज़ा, दोषियों की रिहाई देखी है।
रचयिता - डा. सलोनी चावला



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