"साहित्य का चीर - हरण"
डॉक्टर सलोनी चावला
गीत, ग़ज़ल, कविता का हो रहा तैयार कफ़न,
कतरा कतरा हो रहा साहित्य का चीर- हरण।
रदीफ़ - काफ़िया का परिधान लपेट दिया ग़ज़ल को,
असली इज़्ज़त- बहर की चुनरी नहीं पहनाई ग़ज़ल को।
बिन मुखड़े, बिन अन्तरे के गीत बिल्कुल निर्वस्त्र है,
देकर नज़्म को तरन्नुम, कहते हैं - गीत का वस्त्र है !
अलंकार की एक सिलाई नहीं, पोशाक फटी है कविता की,
गद्य को टुकड़ों में काटकर, यह विधा नहीं है कविता की।
रचनाओं का क्या कहें परिचय भी होता है चोरी,
पकड़ में आ जाएं तो भी, करते हैं सीना ज़ोरी।
रहम करो साहित्य पर यारों, हो रहा मुंडन उसका,
संवार दो जीवन उसका, कहीं टूटे ना कंगन उसका।
वरदान है यह मां शारदा का, मत करो इसका अपमान,
साहित्य का नहीं, तो रख लो, शारदा माँ का ही मान।
रचयिता - डॉक्टर सलोनी चावला



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